मुझे तुम बसंत से लगते हो
जिसे देख सुमन सी मैं खिलती
उर में प्रणय की लहर उठती
जब अंक में तुम भर लेते हो
मुझे तुम बसंत से लगते हो
मेरे नाम में ही अनुराग बसा
और तुम पर्याय मदन के हो
जब प्रेम की बातें करते हो
मुझे तुम बसंत से लगते हो
आई है रुत ये मादक सी
और मै हूँ घटा एक चंचल सी
जब मस्त पवन से बहते हो
मुझे तुम बसंत से लगते हो
हर पलछिन में छाई उमंग
मैं उड़ने लगी बनकर पतंग
जब तुम नभ बन छू लेते हो
मुझे तुम बसंत से लगते हो
Ekta shrivastava
06-Feb-2022 07:49 PM
बहुत लाज़वाब रचना 🤗🙏
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Dr. SAGHEER AHMAD SIDDIQUI
06-Feb-2022 06:39 PM
Nice
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Seema Priyadarshini sahay
06-Feb-2022 06:05 PM
बहुत खूबसूरत
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